Report for the Month of Jan 2010
1. Photography Workshop
2. A Discussion on Main Stream Media and Alternative Media
3. Film Screening
4. Research
एक दिवसीय फोटोग्राफी कार्यशाला
दिनांक – 12 दिसम्बर 2009
स्थान – जागोरी ग्रामीण ज्ञान केन्द्र – शाहपुर
कुल युवा – 16, लड़के – 9, लड़कियां – 7
सामग्री – 4 कैमरे( Still Camera – 3, Handicam – 1 )
कार्यशाला का उद्देश्य –
युवाओं में क्षमता वर्धन करना व उन्हें अच्छी फोटो खींचने में सक्षम बनाना ताकि वह कैमरा अच्छी तरह से प्रयोग कर सकें, एक अच्छी फोटो खींच सकें, फोटो का महत्व समझ सकें और कैमरे की तकनीकी जानकारी भी हासिल कर सकें।
कार्यशाला का विवरण –
इस कार्यशाला की शुरुआत परिचय के साथ हुई। सभी ने अपने नाम के साथ एक मिलता जुलता शब्द जोड़ा जैसे - (श्रवण नाम के साथ सवेरा शब्द) और एक-एक ऐसा काम बताया जो उन्होने पिछले दो महीने में किया हो लेकिन वहां उपस्थित सहभागियों में से किसी ने भी वैसा काम ना किया हो। इस प्रकार का परिचय बहुत ही मजेदार रहा और सभी आपस में जल्दी ही घुल-मिल गये। इस परिचय में काफी मजेदार बातें निकल कर आई जैसे –
• एक लड़की ने अपने गांव में एक गरीब परिवार की बिमार लड़की का इलाज करवाने में मदद की।
• एक युवा साथी ने सारी परंपराओं को तोड़कर व बिना दहेज लिए साधारण तरीके से मंदिर में शादी की जिससे सभी बहुत खुश हुए।
सहभागियों की कार्यशाला से उम्मीदें –
• अच्छी तरह कैमरा चलाना व उसका प्रयोग करना।
• फोटोग्राफी के बारे में ज्यादा से ज्यादा सीखना।
• अच्छी फोटो खींचना।
• फिल्म बनाना सीखना।
कार्यशाला मे सभी सहभागियों को एक-एक फोटो दी गयी और उनसे यह कहा गया कि फोटो को देखने के बाद यह बताएं कि उन्होनें क्या महसूस किया। सभी ने अपने-अपने अनुभव आपस में बांटे और उसके बाद फोटो के महत्व को सामूहिक रूप से समझा।
सामूहिक गतिविधि –
सभी को 4 समूहों में बांटा गया और सभी को एक-एक फोटो खींचने के लिए कहा गया। फोटो खींचने के बाद सभी ने एक दूसरे की फोटो को ध्यान से देखा और खुलकर टिप्पणी की जो कुछ इस प्रकार थी –
• फोटो बहुत दूर से खींची गयी थी।
• फोटो में सफाई नहीं थी।
• फोटो में बहुत सारी फालतू की चीजें थी।
• फोटो धुंधुली थी।
• सिर कटा हुआ दिख रहा था।
इस चर्चा के बाद समूह में उर्जा लाने के लिए एक खेल खेला गया। खेल के बाद चर्चा की गयी कि फोटो खींचते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। जिनमें से मुख्य इस प्रकार थीं –
तकनीकी जानकारी –
• Light
• Focus
• Colors
• Head space
• Frame
• Position
• Composition
• Movement, Perspective
• What position to take?
• What to keep in mind when taking a picture.
• Choice of background.
फोटो खींचने के लिए तैयारी –
• फोटो खींचने से पहले देख लें कि कैमरा अच्छी तरह से काम कर रहा है या नहीं।
• बैटरी जांच लेनी चाहिए।
• मैमरी जांच लेनी चाहिए।
• समय का ध्यान रखना चाहिए।
• यदि किसी की फोटो खींचनी हो तो अनुमति ले लेनी चाहिए।
काफी देर तक इस तरह की चर्चा के बाद फिर से सभी समूहों को एक-एक फोटो खींचने के लिए कहा गया। सभी सहभागियों ने फोटो खींचे और उन्हें ध्यान से देखने के बाद फिर से चर्चा की और यह कि पहले वाली और इस बार की फोटो में क्या अंतर था। सभी सहभागी इस बार बहुत खुश और उत्साहित थे और उन्होने कहा कि -
“पहले जो फोटो खींची थी उसे ऐसे ही खींच लिया, कुछ भी ध्यान में नहीं रखा था।“
“इस बार फ्रेम सैट करके फोटो खींची।“
“इस बात का ध्यान रखा कि फालतू की चीजें फोटो में ना आएं।“
“इस बात का ध्यान रखा कि हम अपनी फोटो से किसी को कुछ समझा सकें”
उन्होने इस तरह की कई बातें कहीं।
अनुभव -
कमियां –
• इस कार्यशाला में कैमरे कम थे इसलिए फोटो खींचने में परेशानी हुई।
• समय कम होने के कारण ज्यादा सुझाव नहीं मिल सके।
• सभी को Handicam चलाने को नहीं मिला।
• कुछ युवाओं की सहभागिता कम थी।
A Discussion on Main Stream Media and Alternative Media
सामान्य रूप से प्रचलित व वैकल्पिक मीडिया के बारे में युवाओं के साथ एक दिवसीय चर्चा
दिनांक – 13 दिसम्बर 2009
स्थान – जागोरी ग्रामीण ज्ञान केन्द्र - शाहपुर
कुल युवा – 15, लड़कियां – 7, लड़के – 8
उद्देश्य -
• स्थानीय मुद्दों को मीडिया के माध्यम से प्रशासन व समाज के सामने लाना जिसमें पूर्ण रूप से युवाओं की भागेदारी हो।
• युवाओं को मीडिया में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करना।
विस्तृत विवरण –
सबसे पहले मीडिया के मुख्य माध्यमों के बारे में चर्चा की गयी कि आजकल कौन-कौन से माध्यम ज्यादा प्रचलित हैं जैसे – अखबार, मैगजीन, टीo वीo और रेड़ियो आदि।
इसके बाद सभी युवाओं ने समूह बनाए व अलग-अलग मीडिया के बारे में ध्यान से विचार-विमर्श किया कि कौन से मीडिया हमें क्या-क्या और कितना-कितना दिखाते व सुनाते हैं।
काफी चर्चा के बाद यह निष्कर्ष निकला कि मीडिया से हमें कई प्रकार की जानकारीयां प्राप्त होती हैं लेकिन उसमें हमारी भागेदारी बिलकुल भी नहीं होती और अधिकतर खबरें हमारे काम की नहीं होती। क्योंकि मीडिया में अधिकतर फिल्मों, गानों, फैशन, खेलों, राजनीतिज्ञों व बड़ी-बड़ी हस्तियों के बारे में ही बताया जाता है और स्थानीय खबरों को महत्व नहीं दिया जाता व ग्रामीण लोगों को नज़रअंदाज किया जाता है जबकि भारत की अधिकतर जनसंख्या ग्रामीण है।
चर्चा में यह स्पष्ट हुआ कि एक अच्छा मीडिया
कैसा होना चाहिए –
• स्थानीय कला को प्रोत्साहन मिले।
• जानकारी का आदान-प्रदान हो।
• आम जनता के लिए हो।
• युवाओं को प्रोत्साहन मिले।
• सामाजिक सुधार हो।
• जिसमें हम केवल दर्शक ना बनें बल्कि उसमें हमारी पूर्ण भागेदारी होनी चाहिए।
चर्चा में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था कि मीडिया में हम अपनी भागेदारी कैसे निभाएं। इसके लिए कुछ विकल्प इस प्रकार रहे -
• हम स्थानीय पत्रकारों के साथ अच्छे संबंध बना सकते हैं।
• हम अपनी अखबार ( News Letter ) बना सकते हैं।
• सामुदायिक रेड़ियो कार्यक्रम बना सकते हैं।
• विडीयो बना सकते हैं।
• कॉमिक बना सकते हैं।
• मीडिया वालों को पत्र लिख सकते हैं।
• अपने लेख मीडिया में दे सकते हैं।
ऊपर लिखित विकल्पों के माध्यम से हम मीडिया में अपनी भागेदारी निभाने की आशावादी कोशिश कर सकते हैं और सामाजिक बदलाव व युवा सशक्तिकरण में भी अपनी भागेदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।
Film Screening
दिनांक – 29 दिसम्बर 2009
स्थान – जागोरी ग्रामीण ज्ञान केन्द्र – शाहपुर
कुल युवा – 20, लड़के – 6, लड़कियां – 14
फिल्म – खुदा के लिए
फिल्म का उद्देश्य – इस फिल्म का मुख्य उद्देश्य था कि युवा धर्म के नाम पर गुमराह किए जाने के बारे में जागरूक हो सकें।
इस फिल्म को देखने के बाद सभी युवाओं ने आपस में
चर्चा की जिसमें काफी सारी बातें निकलकर सामने आयी–
बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, धर्म के रखवाले बनने वाले पुजारी,
मौलवी आदि युवाओं को धर्म के नाम पर गुमराह करके
उनकी शक्ति का गलत प्रयोग करते हैं जिससे आतंकवाद,
व विभिन्न प्रकार के दंगों को बढ़ावा मिलता है और युवा अपने रास्ते से भटक जाते हैं। धर्म की आड़ में ही महिलाओं को उनके कर्तव्य के रूप में कई बोझों को साथ में ले कर चलना पड़ता है। हमें धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़ा नहीं करना चाहिए और मिल-जुलकर रहना चाहिए।
Research Report
हमारे देश में लोकतंत्र शासन है। लोकतंत्र को हम स्वशासन भी कह सकते हैं। स्वशासन अर्थात हमारा अपना शासन। परन्तु यह किस हद तक स्व है। हम स्वशासन के नाम पर नेताओं व प्रतिनिधियों का चुनाव करके अपनी जिम्मेदारी तो निभा देते हैं लेकिन बाद में इसकी खैर खबर लेना उचित नहीं समझते। अधिकतर कहा जाता है कि “आज के युवा कल का नेता हैं” लेकिन विशेषकर युवा वर्ग ही स्वशासन में अपनी भागेदारी को निभाने से दूर होता जा रहा है। अगर युवा राजनीति में प्रवेश ही नहीं करेंगे तो वह कल के नेता कैसे बन सकते हैं। स्वशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत में की जाने वाली ग्राम सभा ही स्वशासन की पहली सीढ़ी और नींव है। मैं कई दिनों से ग्रामीण युवाओं के साथ इस विषय पर बातचीत कर रहा हूँ कि उनकी इस विषय पर क्या राय है? क्यों वे पंचायत के चुनावों में भाग नहीं लेते ? क्यों वे ग्राम सभा की बैठक में भाग नहीं लेते ? युवाओं के अलग-अलग विचार इस तरह से हैं –
• इस तरह के कामों में उन्हे रूचि नहीं हैं।
• गांवों में अधिकतर जाति व धर्म के आधार पर वोट डाले जाते हैं
• उन्हें लगता है कि उनकी गांवों में ज्यादा लोगों के साथ जान-पहचान नहीं होती।
• कई युवा समझते हैं कि राजनीति बेकार की चीज़ है।
अन्य लोग भी यही सोचते हैं कि युवा वर्ग अपने भविष्य निर्माण के लिए अधिकतर समय गांव से बाहर ही रहते हैं जबकि पंचायत प्रतिनिधि बनने के लिए अधिकतर समय गांव में ही रहना पड़ता है। कई ग्रामीणों का मानना है कि युवाओं को स्वशासन में भागेदारी निभाने लिए आगे आना चाहिए और हम उन्हें सहयोग भी देंगे।
नोट – मैं इसी विषय पर एक फिल्म बनाना चाहता हूँ।
Report By –
Madan Lal
Jagori Grameen, Himachal Pradesh
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